क्या आपको भी है बुरी खबरें पढ़ने की लत? जानें क्या है Doomscrolling?

रात के बारह बज रहे हैं। आप थके हुए हैं और बस सोने ही वाले हैं। आप सोचते हैं कि सोने से पहले सिर्फ पांच मिनट के लिए अपना फोन चेक कर लेते हैं। आप एक सोशल मीडिया ऐप खोलते हैं और सामने एक दुखद खबर आती है। कहीं कोई एक्सीडेंट हुआ है या किसी शहर में कोई बड़ा अपराध हुआ है। आप उस खबर को पूरा पढ़ते हैं। इसके बाद नीचे एक और वैसी ही वीडियो आ जाती है। फिर तीसरी फिर चौथी। देखते ही देखते एक घंटा बीत जाता है। आप देश दुनिया की तमाम बुरी खबरों, आर्थिक मंदी की चर्चाओं, राजनीतिक विवादों और डरावने हादसों की जानकारियों से घिर चुके हैं। जब आप आखिरकार फोन बंद करते हैं, तो आपका दिल भारी होता है, दिमाग में अजीब सी बेचैनी होती है और नींद गायब हो चुकी होती है।

अगर आपके साथ ऐसा अक्सर होता है, तो आप अकेले नहीं हैं। आज के डिजिटल युग में रहने वाला लगभग हर दूसरा इंसान इस स्थिति से गुजर रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि हममें से ज्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं है कि हम एक गंभीर मानसिक चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। इस आदत का एक खास नाम है जिसे समझना हमारी मानसिक शांति के लिए बहुत जरूरी हो चुका है। आइए आज इस विषय पर एक गंभीर लेकिन बेहद जरूरी बातचीत करते हैं।

Doomscrolling Meaning: आखिर क्या है यह बला

सरल शब्दों में कहें तो जब कोई इंसान अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर लगातार नकारात्मक, दुखद और निराशाजनक खबरें पढ़ता या देखता रहता है, तो इस आदत को Doomscrolling कहा जाता है। यहां डूम का मतलब है विनाश या कुछ बहुत बुरा होना और स्क्रॉलिंग का मतलब है फोन की स्क्रीन को ऊपर नीचे खिसकाना। जब आप जानते हैं कि सामने दिख रही जानकारी आपको परेशान करेगी, आपकी चिंता बढ़ाएगी, फिर भी आप अपनी उंगली को स्क्रीन पर घिसना बंद नहीं कर पाते, तो आप इसी स्थिति में होते हैं।

इस शब्द की शुरुआत इंटरनेट की दुनिया में कुछ साल पहले हुई थी। खासकर जब पूरी दुनिया एक बड़ी महामारी से जूझ रही थी, तब लोग घरों में कैद थे और लगातार बुरी खबरों के अपडेट देख रहे थे। उस समय यह शब्द अचानक बहुत प्रसिद्ध हो गया। आज यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बन चुका है जो चुपचाप हमारी खुशियों को हमसे छीन रहा है।

दिमाग Doomscrolling को क्यों पसंद करता है

अब एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब कोई चीज हमें परेशान कर रही है, तो हमारा दिमाग उसे बार-बार देखना क्यों चाहता है। हमारा मन किसी अच्छी और प्रेरणादायक कहानी पर इतनी देर क्यों नहीं टिकता जितना किसी बुरी खबर पर टिक जाता है। इसका जवाब हमारे विकासवादी इतिहास और मानव विज्ञान में छिपा है।

लाखों साल पहले जब इंसान जंगलों में रहता था, तब उसके जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी यह जानना था कि खतरा कहां है। किस झाड़ी के पीछे शेर छिपा है या किस रास्ते पर जाना जानलेवा हो सकता है। जो इंसान खतरों के प्रति जितना ज्यादा सतर्क रहता था, उसके जिंदा रहने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती थी। इसी वजह से हमारे दिमाग का एक हिस्सा हमेशा खतरों को ढूंढने और उन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोग्राम हो गया। इसे विज्ञान की भाषा में नेगेटिविटी बायस कहा जाता है।

आज के समय में हमारे आसपास कोई जंगली जानवर तो नहीं है, लेकिन हमारा यह पुराना सर्वाइवल इंस्टिंक्ट यानी जिंदा रहने की मूल भावना आज भी वैसी ही है। जब हम फोन पर कोई बुरी खबर देखते हैं, तो हमारे दिमाग को लगता है कि यह कोई बड़ा खतरा है जिसके बारे में जानना जरूरी है। हमारा दिमाग हमें सुरक्षित रखने के चक्कर में उस बुरी खबर की गहराई में जाने के लिए मजबूर करता है। यही कारण है कि हम एक के बाद एक बुरी खबरें पढ़ते चले जाते हैं।

इसके साथ ही हमारा दिमाग अनिश्चितता से नफरत करता है। जब दुनिया में कुछ भी बुरा या अस्थिर होता है, तो हमें लगता है कि ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठा करके हम स्थिति को कंट्रोल कर सकते हैं। लेकिन असल में होता इसका ठीक उल्टा है। जितनी ज्यादा जानकारी हम लेते हैं, हमारा दिमाग उतना ही ज्यादा डर और तनाव महसूस करने लगता है।

डिजिटल चक्रव्यूह और सोशल मीडिया का मायाजाल

आज के समय में इस समस्या को बढ़ाने में हमारी तकनीक और सोशल मीडिया ऐप्स का बहुत बड़ा हाथ है। इन ऐप्स को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि ये आपकी अटेंशन यानी आपके ध्यान को बांधकर रख सकें। जब आप किसी एक नकारात्मक खबर पर कुछ सेकंड से ज्यादा रुकते हैं, तो इन ऐप्स का एल्गोरिदम यह समझ जाता है कि आप इस तरह की चीजों में रुचि ले रहे हैं। इसके बाद वह आपके सामने वैसी ही और खबरें परोसना शुरू कर देता है।

ब्रेकिंग न्यूज के चमकीले अलर्ट, बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन और रील्स या शॉर्ट वीडियो का कभी न खत्म होने वाला अंतहीन लूप हमें एक अजीब से जाल में फंसा देता है। यहां हर नया स्क्रॉल एक सस्पेंस की तरह होता है। दिमाग को लगता है कि शायद अगले स्क्रॉल में कुछ नया या कुछ बेहतर देखने को मिलेगा। यह व्यवहार ठीक वैसा ही है जैसा किसी जुए की मशीन के सामने बैठे इंसान का होता है। इसे रिवॉर्ड सीकिंग बिहेवियर कहते हैं, जहां हमारा दिमाग लगातार कुछ नया खोजने की चाह में स्क्रीन से चिपका रहता है।

दैनिक जीवन में इसके कुछ वास्तविक उदाहरण

इस आदत को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें अपने रोज के व्यवहार पर नजर डालनी होगी। इसके कुछ बहुत ही सामान्य उदाहरण हमारे घरों में रोज देखे जा सकते हैं।

जैसे दोपहर में काम के बीच सिर्फ एक छोटी सी न्यूज रिपोर्ट देखने के लिए फोन उठाना और फिर आधे घंटे तक लगातार उसी से जुड़ी दूसरी डरावनी कहानियां पढ़ते चले जाना। या फिर जब शहर में कोई बड़ी दुर्घटना या राजनीतिक हलचल हो, तो काम धंधा छोड़कर हर पांच मिनट में अपडेट चेक करना। कई बार लोग सोते समय या सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले दुनिया भर के अपराधों की लिस्ट देखने लगते हैं। जब आप एक ही तरह के नकारात्मक कंटेंट को बार-बार देखते हैं, तो आपका पूरा नजरिया ही बदलने लगता है।

Mental Health पर Doomscrolling का गहरा असर

लगातार बुरी खबरों के साये में रहने से हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत ही विनाशकारी असर पड़ता है। जब हम लगातार तनावपूर्ण बातें पढ़ते हैं, तो हमारा शरीर हर समय एक अलर्ट मोड में रहता है। इससे शरीर में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ने लगते हैं।

चिंता और विचारों का तूफान

इसका सीधा परिणाम Anxiety और Overthinking के रूप में सामने आता है। आप हर छोटी बात को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता करने लगते हैं। आपको लगने लगता है कि दुनिया एक बेहद असुरक्षित जगह है और आपके या आपके परिवार के साथ कभी भी कुछ भी बुरा हो सकता है। यह डर आपके सोचने समझने की क्षमता को कमजोर कर देता है।

नींद की बर्बादी और शारीरिक थकान

क्या आपने कभी सोचा है कि पूरा दिन ऑफिस में सिर्फ कुर्सी पर बैठने के बाद भी आप शाम को इतने थके हुए क्यों महसूस करते हैं? कई बार हम शारीरिक रूप से कोई भारी काम नहीं करते, फिर भी हमें भयंकर Mental Fatigue यानी मानसिक थकान का अहसास होता है। इसका कारण यही है कि हमारा दिमाग लगातार नकारात्मक सूचनाओं को प्रोसेस करते-करते थक चुका होता है। जब आप सोने से ठीक पहले ऐसी चीजें देखते हैं, तो आपकी Sleep Quality खराब हो जाती है। आप गहरी नींद नहीं सो पाते और सुबह उठकर भी खुद को थका हुआ ही पाते हैं।

फोकस और प्रोडक्टिविटी का नुकसान

जब दिमाग में हर समय दुनिया भर की परेशानियां घूम रही हों, तो किसी एक काम पर ध्यान लगाना असंभव हो जाता है। आपकी Productivity यानी काम करने की क्षमता तेजी से गिरती है। आप ऑफिस के काम में गलतियां करने लगते हैं और छोटे-छोटे फैसले लेने में भी आपको बहुत कठिनाई महसूस होने लगती है।

मूड और रिश्तों पर असर

जो इंसान अंदर से हमेशा परेशान और डरा हुआ रहेगा, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा होना स्वाभाविक है। इस चिड़चिड़ेपन का सीधा असर आपके परिवार और दोस्तों के साथ आपके संबंधों पर पड़ता है। आप छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होने लगते हैं और अपनी इमोशनल एनर्जी खो देते हैं।

क्या आप Doomscrolling के शिकार हैं?

इस आदत से बाहर निकलने के लिए सबसे पहले यह पहचानना जरूरी है कि क्या आप वाकई इसके शिकार हो चुके हैं। यहां कुछ ऐसे संकेत दिए जा रहे हैं जिन्हें देखकर आप खुद का अंदाजा लगा सकते हैं।

अगर आप फोन उठाने के बाद समय का अंदाजा भूल जाते हैं और घंटों तक सिर्फ नकारात्मक खबरें ही देखते रहते हैं, तो यह एक बड़ा संकेत है। क्या सोशल मीडिया बंद करने के बाद आपको अपने पेट में एक अजीब सी बेचैनी या भारीपन महसूस होता है? क्या आपको ऐसा लगता है कि अगर आपने आज की कोई बड़ी बुरी खबर नहीं जानी, तो आप दुनिया से पीछे छूट जाएंगे? अगर इन सभी बातों का जवाब हां है, तो निश्चित रूप से आप इस लूप में फंस चुके हैं।

क्या Doomscrolling से Anxiety बढ़ सकती है?

मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो इस सवाल का जवाब पूरी तरह से हां है। जब हम किसी डरावनी या दुखद घटना के बारे में पढ़ते हैं, तो हमारा दिमाग काल्पनिक रूप से खुद को उस स्थिति में रखकर देखने लगता है। अगर आप लगातार मंदी, बीमारियों या हादसों के बारे में पढ़ेंगे, तो आपका अवचेतन मन यह मान लेगा कि यह सब आपके साथ भी होने वाला है।

यह आदत धीरे-धीरे एक क्रोनिक स्ट्रेस का रूप ले लेती है। इससे व्यक्ति का पैनिक लेवल बढ़ जाता है और वह छोटी-मोटी रोजमर्रा की समस्याओं में भी घबराने लगता है। इसलिए यह केवल एक समय बर्बाद करने वाली आदत नहीं है, बल्कि यह आपके मानसिक संतुलन को बिगाड़ने वाला एक गंभीर कारक है।

बुरी खबरें पढ़ना पूरी तरह गलत नहीं है

यहां एक बात को बहुत स्पष्टता से समझना होगा। दुनिया में क्या चल रहा है, इस बात से वाकिफ रहना बिल्कुल गलत नहीं है। एक जागरूक नागरिक होने के नाते हमें बड़ी घटनाओं, सरकारी नियमों या समाज के हालातों की जानकारी होनी चाहिए। जानकारी हमें सुरक्षित रखती है और सही फैसले लेने में मदद करती है।

समस्या जानकारी रखने से नहीं है, समस्या उस जानकारी के अतिरेक से है। जब आप किसी घटना की जरूरी जानकारी लेने के बाद भी सिर्फ सनसनीखेज डिटेल्स के लिए उसे बार-बार पढ़ते रहते हैं, तो वह जागरूकता नहीं बल्कि एक लत बन जाती है। हमें जागरूक होने और खुद को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के बीच की एक बारीक रेखा को पहचानना होगा।

मोबाइल और सोशल मीडिया की लत से कनेक्शन

यह पूरी समस्या सीधे तौर पर हमारे स्क्रीन टाइम और Mobile Addiction से जुड़ी हुई है। आज हमारा फोन सिर्फ एक बातचीत का साधन नहीं रहा, बल्कि यह हमारे दिमाग को लगातार उत्तेजित रखने वाला एक यंत्र बन चुका है। Digital Overload के कारण हमारे दिमाग में इतना ज्यादा डिजिटल कचरा जमा हो जाता है कि नई और अच्छी बातों के लिए जगह ही नहीं बचती। जब तक हम अपनी Social Media Addiction पर काबू नहीं पाएंगे, तब तक इस मानसिक जाल से बाहर निकलना बहुत मुश्किल होगा।

Doomscrolling से बाहर निकलने के व्यावहारिक तरीके

अगर आप इस आदत को छोड़ना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको कुछ बेहद व्यावहारिक और जमीन से जुड़े कदम उठाने होंगे। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो एक दिन में बदल जाएगी, लेकिन सही आदतों से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

सूचनाओं के उपभोग का समय तय करें

सबसे पहले तो खबरें देखने का एक निश्चित समय तय करें। दिन भर में सिर्फ एक या दो बार ही समाचार देखें, वह भी सिर्फ मुख्य जानकारियों के लिए। कभी भी सुबह उठते ही और रात को सोने से कम से कम एक घंटा पहले किसी भी तरह की न्यूज या सोशल मीडिया का इस्तेमाल न करें। सुबह का समय आपके पूरे दिन का मूड तय करता है और रात का समय आपकी नींद की क्वालिटी तय करता है। इन दोनों समय को पूरी तरह सुरक्षित रखें।

नोटिफिकेशन पर लगाम लगाएं

अपने फोन से तमाम न्यूज ऐप्स और सोशल मीडिया के ब्रेकिंग न्यूज वाले नोटिफिकेशन को तुरंत बंद कर दें। जब कोई सूचना आपके स्क्रीन पर अचानक चमकती है, तो वह आपके दिमाग को अपनी तरफ खींच लेती है। जब नोटिफिकेशन बंद होंगे, तो आप अपनी मर्जी से फोन छुएंगे, न कि फोन के बुलाने पर।

डिजिटल सीमाएं तय करें

अपने फोन में स्क्रीन टाइम ट्रैकर का इस्तेमाल करें। सोशल मीडिया ऐप्स के लिए एक दैनिक समय सीमा तय कर दें, जैसे कि दिन भर में सिर्फ आधा घंटा। जैसे ही वह समय पूरा हो, ऐप अपने आप लॉक हो जाना चाहिए। इससे आपको अपने व्यवहार को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

डिजिटल डिटॉक्स की आदत डालें

हफ्ते में कम से कम एक दिन या दिन में कुछ घंटे ऐसे रखें जब आप तकनीक से पूरी तरह दूर रहें। इसे Digital Detox कहा जाता है। इस खाली समय में आप किताबें पढ़ सकते हैं, पेड़ पौधों की देखभाल कर सकते हैं, या अपने परिवार के साथ बैठकर कोई पुरानी यादें ताजा कर सकते हैं। अपने दिमाग को इस डिजिटल शोर से दूर कुछ पल शांति के दें।

कंटेंट का चुनाव

सोशल मीडिया पर उन अकाउंट्स को अनफॉलो या म्यूट कर दें जो लगातार नकारात्मकता, विवाद और सनसनीखेज चीजें पोस्ट करते हैं। इसके बजाय उन लोगों और पेजों को फॉलो करें जो आपको कुछ नया सिखाते हों, जो आपको हंसाते हों या जो जीवन के प्रति एक सकारात्मक नजरिया देते हों। याद रखें कि आप अपने दिमाग को जो खिलाएंगे, वह वैसा ही सोचेगा। Stress Management का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि आप अपने मानसिक आहार को शुद्ध रखें।

दुनिया में हर तरह की चीजें होती हैं, अच्छी भी और बुरी भी। जागरूक रहना और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना हमारे लिए बेहद जरूरी है। लेकिन जब हम हर समय सिर्फ डर, नफरत और हादसों की खबरों से खुद को घेरे रहते हैं, तो हम अनजाने में अपने सोचने, महसूस करने और जिंदगी को जीने के तरीके को बदल रहे होते हैं। हमारा दिमाग एक बहुत ही नाजुक और खूबसूरत चीज है, इसे किसी कचरे के डिब्बे की तरह इस्तेमाल न करें जहां हर तरह की सनसनीखेज खबरें आकर जमा होती रहें। अपनी डिजिटल आदतों को बदलें, एक जागरूक लेकिन शांत जीवन जिएं, क्योंकि आपकी मानसिक शांति से बढ़कर इस दुनिया में और कुछ भी कीमती नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं सामान्य रूप से न्यूज पढ़ रहा हूं या डूमस्क्रॉलिंग कर रहा हूं?

जब आप किसी खबर को सिर्फ जानकारी के लिए पढ़ते हैं और उसके बाद अपने काम में लग जाते हैं, तो वह सामान्य है। लेकिन जब आप किसी बुरी खबर को पढ़कर परेशान होने के बाद भी लगातार उसी से जुड़ी अन्य नकारात्मक बातें घंटों तक खोजते रहते हैं, तो वह डूमस्क्रॉलिंग है।

क्या इस आदत का हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी कोई असर पड़ता है?

हां, मानसिक तनाव सीधे तौर पर हमारे शरीर को प्रभावित करता है। इससे शरीर में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन बढ़ता है, जो लंबे समय में ब्लड प्रेशर, पाचन तंत्र की खराबी और लगातार रहने वाले सिरदर्द जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।

बच्चों को इस तरह की डिजिटल आदत से कैसे दूर रखा जाए?

बच्चों के सामने खुद एक उदाहरण पेश करें। घर में बिना फोन का एक समय तय करें जहां सब साथ बैठें। बच्चों को स्क्रीन देने के बजाय उन्हें बाहरी खेलों, किताबों और रचनात्मक कामों में व्यस्त रखने की कोशिश करें।

क्या रात में डूमस्क्रॉलिंग करना ज्यादा नुकसानदेह है?

हां, रात के समय फोन से निकलने वाली ब्लू लाइट हमारे दिमाग में मेलाटोनिन नामक हार्मोन को बनने से रोकती है, जो नींद के लिए जरूरी है। इसके साथ ही रात में बुरी खबरें पढ़ने से दिमाग शांत नहीं हो पाता और नींद का पूरा चक्र बिगड़ जाता है।

क्या सोशल मीडिया को पूरी तरह से छोड़ देना ही इसका एकमात्र उपाय है?

बिल्कुल नहीं। सोशल मीडिया हमारे जुड़ने और सीखने का एक बेहतरीन जरिया भी है। जरूरत इसे छोड़ने की नहीं बल्कि इसके सचेत और सीमित इस्तेमाल की है। सही लोगों को फॉलो करके और समय सीमा तय करके इसका सही उपयोग किया जा सकता है।

जब भी मैं फोन छोड़ता हूं, मुझे कुछ छूट जाने का डर सताता है, इसे कैसे संभालें?

इसे फियर ऑफ मिसिंग आउट कहा जाता है। यह बात समझें कि दुनिया की हर खबर को तुरंत जानना आपके जिंदा रहने या आगे बढ़ने के लिए जरूरी नहीं है। कुछ जरूरी चीजें आपको दूसरों से भी पता चल जाएंगी। अपनी मानसिक शांति को कुछ खबरों से ऊपर स्थान दें।

Editorial
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