Silent Scrolling Syndrome: 2026 की वो खतरनाक आदत जो आपका कीमती समय और सुकून छीन रही है

रात के ग्यारह बज चुके हैं। आप अगले दिन सुबह जल्दी उठने का संकल्प लेकर अपने बिस्तर पर जाते हैं। सोने से ठीक पहले आप सोचते हैं कि बस पांच मिनट के लिए अपना फोन देख लेते हैं। आप इंस्टाग्राम खोलते हैं या फिर यूट्यूब शॉर्ट्स की फीड पर जाते हैं। आप एक वीडियो देखते हैं, फिर दूसरा, फिर तीसरा। देखते ही देखते समय तेजी से भागने लगता है।

जब आप अचानक घड़ी देखते हैं, तो पूरे चालीस मिनट बीत चुके होते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आपको ठीक से याद भी नहीं है कि आपने पिछले चालीस मिनट में क्या देखा। आपका दिमाग थका हुआ महसूस कर रहा है, लेकिन एक अजीब सी बेचैनी और असंतुष्टि भी है। आप फोन को तकिए के नीचे रखते हैं, लेकिन सिर्फ दो मिनट बाद आपका हाथ दोबारा फोन उठाकर लॉक खोलने के लिए मचल जाता है।

अगर यह स्थिति आपको अपनी खुद की कहानी लगती है, तो आप अकेले नहीं हैं। आज भारत के करोड़ों लोग हर दिन इसी मानसिक चक्र से गुजर रहे हैं। साल 2026 में यह व्यवहार एक महामारी की तरह फैल चुका है। मनोविज्ञान की भाषा में इस आदत को Silent Scrolling Syndrome का नाम दिया गया है। यह कोई आधिकारिक मेडिकल बीमारी नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक व्यवहारिक समस्या है जो हमारी मानसिक सेहत को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां इंसान बिना किसी उद्देश्य, बिना किसी जागरूकता और बिना किसी वास्तविक आनंद के लगातार डिजिटल कंटेंट को कंज्यूम करता चला जाता है।

क्या है Silent Scrolling Syndrome

सरल शब्दों में कहें तो जब आप बिना किसी खास वजह के अपने फोन की स्क्रीन को ऊपर की तरफ खिसकाते रहते हैं और आपको यह भी नहीं पता होता कि आप क्या ढूंढ रहे हैं, तो आप इस सिंड्रोम के दायरे में आ चुके हैं। इसमें व्यक्ति कंटेंट का आनंद लेने के लिए फोन नहीं चलाता, बल्कि वह सिर्फ अपनी उंगलियों को एक आदत के तहत चलाता रहता है। इसमें न तो कोई गहरी जानकारी हासिल होती है और न ही मन को कोई शांति मिलती है। यह एक तरह का साइलेंट एडिक्शन है जो बिना कोई शोर मचाए हमारी सोचने और समझने की क्षमता को निगल रहा है।

साल 2026 में यह आदत इतनी आम क्यों हो गई

पिछले कुछ सालों में इंटरनेट की रफ्तार बहुत तेज हुई है और डेटा बेहद सस्ता हो गया है। साल 2026 तक आते-आते रील्स और शॉर्ट्स जैसे शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स ने इंसानी व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। आज हर व्यक्ति के हाथ में एक ऐसा सुपरकंप्यूटर है जो उसकी हर पसंद और नापसंद को जानता है। यह सिंड्रोम इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि आज के समय में कंटेंट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसे छोड़ना नामुमकिन हो जाए।

अब आपको कुछ नया देखने के लिए क्लिक भी नहीं करना पड़ता, बस एक उंगली घुमानी है और एक नया संसार आपके सामने आ जाता है। इस आसान पहुंच ने इंसानी दिमाग को आलसी और पूरी तरह से स्क्रीन पर निर्भर बना दिया है।

रील्स और शॉर्ट्स ने हमारी ध्यान लगाने की क्षमता को कैसे बदला

शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स ने हमारी ध्यान लगाने की क्षमता यानी Attention Span को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। जब आप पंद्रह से तीस सेकंड का वीडियो देखते हैं, तो आपके दिमाग को बहुत कम समय में एक पूरा इमोशन मिल जाता है। एक वीडियो में कोई हंस रहा है, अगले ही सेकंड दूसरे वीडियो में कोई दुखी है, और तीसरे वीडियो में कोई खतरनाक स्टंट कर रहा है।

दिमाग को इतनी तेजी से बदलते हुए भावों को समझने की आदत हो जाती है। इसका नुकसान यह होता है कि जब आपको असल जिंदगी में कोई किताब पढ़नी होती है, किसी गंभीर मुद्दे पर काम करना होता है, या किसी की लंबी बात सुननी होती है, तो आपका दिमाग तुरंत ऊब जाता है। आपकी Focus Power इतनी कमजोर हो जाती है कि आप पांच मिनट भी किसी एक काम पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते।

ऊबने के बाद भी हम स्क्रॉल क्यों करते रहते हैं

अक्सर देखा गया है कि लोग सोशल मीडिया देखते-देखते बोर हो जाते हैं, फिर भी वे फोन बंद नहीं करते। मनोविज्ञान के अनुसार, इसका कारण हमारा बोरियत से डरना है। आज का आधुनिक इंसान अकेले बैठने या खाली बैठने से डरता है। जैसे ही दिमाग को एक सेकंड की खाली जगह मिलती है, वह तुरंत फोन की तरफ भागता है। भले ही सामने चल रहा कंटेंट उबाऊ हो, लेकिन दिमाग को लगता है कि शायद अगला वीडियो मजेदार होगा। इसी शायद के चक्कर में इंसान घंटों बर्बाद कर देता है। मनोरंजन खत्म होने के बाद भी स्क्रॉलिंग इसलिए जारी रहती है क्योंकि उंगली चलाना एक अनैच्छिक क्रिया बन चुका होता है, जिस पर हमारा कोई सचेत नियंत्रण नहीं रहता।

इंसानी दिमाग पर अंतहीन कंटेंट का असर

जब हमारा दिमाग लगातार बिना रुके जानकारी और विजुअल्स को देखता रहता है, तो वह एक तरह के ओवरलोड मोड में चला जाता है। इसे मनोविज्ञान में Information Overload कहा जाता है। हमारा दिमाग एक दिन में एक सीमित मात्रा में ही डेटा को प्रोसेस कर सकता है। जब आप लगातार सैकड़ों रील्स देखते हैं, तो दिमाग हर वीडियो के रंग, आवाज, और भावना को प्रोसेस करने की कोशिश करता है।

भले ही आप शारीरिक रूप से शांत बैठे हों, लेकिन आपका दिमाग एक बहुत ही थका देने वाली मैराथन दौड़ रहा होता है। इसके कारण मस्तिष्क की नई यादें बनाने की और गहरी सोच में जाने की क्षमता धीरे-धीरे नष्ट होने लगती है।

क्या आप Silent Scrolling Syndrome के शिकार हैं

इस बात को समझने के लिए आपको अपने दैनिक व्यवहार पर नजर डालनी होगी। कुछ ऐसे स्पष्ट संकेत हैं जो बताते हैं कि आप इस मानसिक जाल में फंस चुके हैं।

बिना किसी काम या नोटिफिकेशन के अचानक फोन उठा लेना इसका सबसे पहला लक्षण है। कई बार आप समय देखने के लिए फोन उठाते हैं, लेकिन बिना जाने आप किसी सोशल मीडिया ऐप के अंदर चले जाते हैं और बीस मिनट बाद आपको होश आता है कि आप क्या कर रहे थे।

ऐप्स को ऑटोमैटिक तरीके से खोलना भी एक बड़ा संकेत है। जैसे ही आप फोन अनलॉक करते हैं, आपका अंगूठा अपने आप उस जगह पर चला जाता है जहां इंस्टाग्राम या यूट्यूब का आइकन होता है। इसके लिए आपको सोचना नहीं पड़ता।

स्क्रॉलिंग करते समय वक्त का अंदाजा पूरी तरह खो देना इसका एक और प्रमुख लक्षण है। आपको लगता है कि अभी सिर्फ दो मिनट हुए हैं, जबकि असल में आधा घंटा बीत चुका होता है।

लगातार फोन चलाने के बाद सिर में एक भारीपन महसूस होना, आंखों में थकान होना और मानसिक रूप से खुद को पूरी तरह खाली पाना भी इसके लक्षण हैं।

अपने जरूरी काम पर ध्यान न लगा पाना और हर थोड़ी देर में फोन की स्क्रीन को चेक करने की तीव्र इच्छा होना यह दर्शाता है कि आपकी निर्भरता बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। कंटेंट देखने के बाद भी मन में कोई खुशी या संतुष्टि न मिलना बल्कि एक अजीब सा खालीपन महसूस होना इसका सबसे बड़ा सबूत है।

मानसिक स्वास्थ्य के साथ इसका गहरा संबंध

यह आदत केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध Mobile Addiction और Screen Time Anxiety से है। जब आप बहुत ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं, तो आपके भीतर एक अनजाना तनाव पैदा होता है। इसे Digital Clutter कहा जाता है, जहां आपके दिमाग में फालतू की सूचनाओं का ढेर लग जाता है। यह ढेर आगे चलकर Overthinking को जन्म देता है। आप उन चीजों के बारे में सोचने लगते हैं जिनका आपकी असल जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है।

इसके कारण Mental Fatigue यानी मानसिक थकावट इतनी बढ़ जाती है कि आप दिनभर भारी-भारी महसूस करते हैं। शारीरिक रूप से कोई मेहनत न करने के बाद भी आप हमेशा थके हुए रहते हैं। इससे आपकी Productivity पर बहुत बुरा असर पड़ता है। दफ्तर का काम हो या पढ़ाई, आपकी परफॉर्मेंस लगातार गिरने लगती है।

नींद की समस्या यानी Sleep Quality खराब होना इसका एक और बेहद खतरनाक परिणाम है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी हमारे दिमाग में मेलाटोनिन नाम के हार्मोन को बनने से रोकती है, जिससे समय पर नींद नहीं आती और सुबह उठने पर ताजगी महसूस नहीं होती। यही आदत आगे चलकर Anxiety, Stress और Poor Focus का मुख्य कारण बनती है।

दिमाग Scroll करना क्यों नहीं छोड़ पाता: इसके पीछे का विज्ञान

इस सिंड्रोम को गहराई से समझने के लिए हमें अपने दिमाग के भीतर चलने वाले केमिकल लोचे को समझना होगा। हमारे दिमाग में एक न्यूरोट्रांसमीटर होता है जिसे डोपामाइन कहा जाता है। इसे आम भाषा में फील-गुड केमिकल या रिवॉर्ड केमिकल भी कहते हैं। जब भी हम कोई नया या मजेदार काम करते हैं, तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है, जिससे हमें खुशी मिलती है।

शॉर्ट वीडियो के इस दौर में Dopamine Seeking Behavior अपनी चरम सीमा पर है। सोशल मीडिया ऐप्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे एक वेरिएबल रिवॉर्ड लूप की तरह काम करते हैं। इसका मतलब है कि आपको नहीं पता कि अगले स्क्रॉल पर आपको क्या मिलने वाला है। हो सकता है अगला वीडियो बहुत फनी हो, या हो सकता है वह बहुत बेकार हो। यह ठीक एक जुए की मशीन की तरह काम करता है। दिमाग इसी सस्पेंस के कारण बार-बार स्क्रीन को खिसकाता है कि शायद अब कुछ बहुत अच्छा देखने को मिलेगा।

इसके साथ ही यह आदत Behavioral Conditioning पर आधारित है। जब आप बार-बार तनाव या बोरियत से बचने के लिए फोन का इस्तेमाल करते हैं, तो दिमाग इसे एक शॉर्टकट की तरह याद कर लेता है। अब जब भी आप लाइफ में थोड़ा सा भी अकेला या उदास महसूस करेंगे, आपका दिमाग तुरंत कहेगा कि फोन उठाओ और स्क्रॉल करो। यह भावनात्मक पलायन यानी Emotional Escape का एक बहुत ही खतरनाक रास्ता है जो हमें असल समस्याओं का सामना करने से रोकता है।

आधुनिक एल्गोरिदम का मायाजाल

सोशल मीडिया कंपनियां दुनिया के सबसे बेहतरीन मनोवैज्ञानिकों और डेटा साइंटिस्ट्स की मदद से अपने ऐप्स तैयार करती हैं। इन ऐप्स का एकमात्र उद्देश्य है आपकी Attention को ज्यादा से ज्यादा समय तक पकड़कर रखना। इसके लिए वे कई तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं।

सबसे पहला हथियार है ऑटोप्ले और इनफिनिट फीड। पहले के समय में इंटरनेट पर पेज खत्म होते थे, जहां आपको अगले पेज पर जाने के लिए क्लिक करना पड़ता था। अब फीड कभी खत्म ही नहीं होती। आप जितना नीचे जाएंगे, कंटेंट उतना ही आता जाएगा। दिमाग को कहीं भी रुकने का कोई प्राकृतिक संकेत नहीं मिलता।

दूसरा हथियार है पर्सनलाइज्ड कंटेंट और रिकमेंडेशन। एल्गोरिदम यह ट्रैक करता है कि आपने किस वीडियो पर कितने सेकंड का ठहराव किया। अगर आपने किसी फिटनेस वीडियो को पांच सेकंड ज्यादा देख लिया, तो आपकी पूरी फीड फिटनेस के वीडियो से भर जाएगी। आपको वही परोसा जाता है जो आप देखना चाहते हैं, जिससे आपका वहां से हटना असंभव हो जाता है। इसके ऊपर से समय-समय पर आने वाले रंग-बिरंगे नोटिफिकेशंस आपको बार-बार खींचकर ऐप के अंदर ले आते हैं।

क्या Silent Scrolling Syndrome और Doomscrolling एक ही चीज हैं

कई लोग इन दोनों शब्दों को लेकर भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन इनमें एक बहुत ही बारीक और महत्वपूर्ण अंतर है। Doomscrolling का मतलब होता है लगातार नकारात्मक, दुखद और डरावनी खबरों को पढ़ते रहना। जैसे किसी युद्ध, महामारी या आर्थिक मंदी के समय लोग लगातार बुरी खबरें ढूंढकर पढ़ते हैं। इसमें व्यक्ति का दिमाग डर और चिंता से भरा होता है, फिर भी वह पढ़ना बंद नहीं कर पाता।

इसके विपरीत, Silent Scrolling Syndrome में कंटेंट का नकारात्मक होना जरूरी नहीं है। इसमें व्यक्ति बिना किसी खास भावना के, बिल्कुल सुन्न होकर हर तरह का कंटेंट देखता जाता है। इसमें कुकिंग वीडियो, डांस, मीम्स, न्यूज सब कुछ मिक्स होता है। Doomscrolling में इंसान सचेत रूप से डर की वजह से जुड़ा होता है, जबकि इस सिंड्रोम में इंसान पूरी तरह से बेहोशी की हालत में होता है। हालांकि, दोनों ही स्थितियां Mental Health के लिए बेहद नुकसानदेह हैं।

इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के व्यावहारिक तरीके

इस लत से पूरी तरह छुटकारा पाना एक दिन में संभव नहीं है, लेकिन अपनी आदतों में छोटे और व्यावहारिक बदलाव करके आप अपने दिमाग पर दोबारा नियंत्रण पा सकते हैं। इसके लिए आपको कुछ बेहद आसान और प्रभावी कदम उठाने होंगे।

डिजिटल सीमाएं तय करें

सबसे पहले अपने फोन के साथ कुछ कड़े नियम बनाएं। अपने फोन में मौजूद ऐप्स के लिए डेली टाइम लिमिट सेट करें। आज हर स्मार्टफोन में डिजिटल वेलबिंग या स्क्रीन टाइम का फीचर होता है। वहां जाकर सोशल मीडिया ऐप्स के लिए हर दिन का समय निश्चित कर दें। जैसे ही वह समय पूरा होगा, ऐप अपने आप बंद हो जाएगा। यह आपको सचेत रूप से याद दिलाएगा कि आपकी सीमा समाप्त हो चुकी है।

नोटिफिकेशन को मैनेज करें

आपके फोन के बजने वाले नोटिफिकेशंस आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं। सोशल मीडिया ऐप्स के सभी नॉन-एसेंशियल नोटिफिकेशंस को पूरी तरह से बंद कर दें। जब फोन बार-बार चमकेगा नहीं और आवाज नहीं करेगा, तो आपका दिमाग भी बार-बार उसकी तरफ आकर्षित नहीं होगा। फोन को हमेशा साइलेंट मोड पर या उल्टा करके रखने की आदत डालें।

फोन फ्री जोन और टाइम बनाएं

अपने घर में कुछ जगहों को पूरी तरह से फोन फ्री घोषित कर दें, जैसे कि आपका डाइनिंग टेबल और आपका बिस्तर। खाना खाते समय फोन का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। इसी तरह, रात को सोने से ठीक एक घंटा पहले और सुबह उठने के ठीक एक घंटे बाद तक फोन को खुद से दूर रखें। फोन को अपने बिस्तर से इतनी दूर रखें कि उसे उठाने के लिए आपको चलकर जाना पड़े।

डोपामाइन डिटॉक्स की शुरुआत करें

हफ्ते में कम से कम एक दिन या दिन में कुछ घंटे Digital Detox के लिए सुरक्षित रखें। इस दौरान खुद को हर तरह की स्क्रीन से दूर कर लें। शुरुआत में आपका दिमाग बहुत बेचैन होगा और बार-बार फोन मांगेगा, लेकिन धीरे-धीरे आपके दिमाग का डोपामाइन लेवल नॉर्मल होने लगेगा। इसे Dopamine Seeking Behavior को शांत करने का सबसे बेहतरीन तरीका माना जाता है।

जागरूकता के साथ फोन चलाएं

जब भी आप अपना फोन उठाएं, खुद से एक छोटा सा सवाल पूछें कि मैं इस वक्त फोन क्यों छू रहा हूं। क्या मुझे कोई जरूरी काम है, या मैं सिर्फ बोर हो रहा हूं। इस सवाल को पूछने से आपका दिमाग बेहोशी की हालत से बाहर आ जाएगा और आप सचेत होकर फैसला ले पाएंगे। इसे Mindful Content Consumption कहा जाता है।

असल दुनिया की गतिविधियों से जुड़ें

जब आप स्क्रीन का समय कम करेंगे, तो आपके पास बहुत सारा खाली समय बचेगा। इस समय का उपयोग उन कामों में करें जो आपको असल में खुशी देते हैं। कोई किताब पढ़ें, पौधों की देखभाल करें, दोस्तों या परिवार के साथ बैठकर आमने-सामने बात करें, या फिर कोई नया खेल खेलें। जब आपके दिमाग को असल जिंदगी से स्वस्थ डोपामाइन मिलने लगेगा, तो उसकी डिजिटल निर्भरता अपने आप कम हो जाएगी।

निष्कर्ष: ध्यान की शक्ति को वापस पाना

Silent Scrolling Syndrome का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि यह हमारे दिन के दो या तीन घंटे बर्बाद कर देता है। समय तो वापस कमाया जा सकता है, लेकिन इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह हमसे हमारी जागरूकता, हमारा आत्म-नियंत्रण और हमारी सोचने की गहरी क्षमता को छीन रहा है। हम धीरे-धीरे एक ऐसे समाज में बदल रहे हैं जो अपनी मर्जी से सोच भी नहीं सकता, जिसे हर सेकंड अपने दिमाग को शांत रखने के लिए किसी बाहरी स्क्रीन की जरूरत पड़ती है।

अपनी स्क्रीन पर अंगुली चलाने से पहले एक पल रुकें और सोचें कि क्या आप सच में इस कंटेंट को देखना चाहते हैं, या फिर आपका दिमाग किसी अदृश्य एल्गोरिदम का गुलाम बन चुका है। अपनी चेतना को वापस जगाइए, फोन को एक तरफ रखिए, और अपनी जिंदगी को दोबारा अपनी शर्तों पर जीना शुरू कीजिए। आपकी Focus Power और आपका मानसिक सुकून आपके अपने हाथों में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Silent Scrolling Syndrome के मुख्य लक्षण क्या हैं?

इसके मुख्य लक्षणों में बिना किसी ठोस वजह के बार-बार फोन उठाना, सोशल मीडिया ऐप्स को बिना सोचे-समझे स्वचालित रूप से खोलना, स्क्रीन देखते समय समय का पता न चलना, और लंबे समय तक स्क्रॉल करने के बाद मानसिक रूप से पूरी तरह थका हुआ महसूस करना शामिल है। इसमें व्यक्ति बिना किसी आनंद या उद्देश्य के लगातार कंटेंट देखता चला जाता है।

क्या बहुत ज्यादा रील्स देखने से हमारी याददाश्त कमजोर हो सकती है?

हां, बहुत ज्यादा रील्स और शॉर्ट्स देखने का हमारी याददाश्त और एकाग्रता पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है। जब दिमाग को हर कुछ सेकंड में बिल्कुल नई और अलग तरह की जानकारी मिलती है, तो वह उसे शॉर्ट-टर्म मेमोरी से लॉन्ग-टर्म मेमोरी में ट्रांसफर नहीं कर पाता। इसके कारण चीजों को याद रखने की क्षमता और Focus Power कमजोर होने लगती है।

बिना कुछ भारी काम किए भी फोन चलाने के बाद इतनी मानसिक थकावट क्यों होती है?

जब आप लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करते हैं, तो आपका दिमाग शांत नहीं होता। वह हर सेकंड नए रंगों, ध्वनियों, चेहरों और भावनाओं को प्रोसेस कर रहा होता है। यह अत्यधिक सूचनाओं का प्रवाह यानी Information Overload दिमाग को बहुत बुरी तरह थका देता है। इसी कारण शारीरिक रूप से आराम करने के बावजूद व्यक्ति Mental Fatigue का अनुभव करता है।

Dopamine Detox क्या है और यह इस सिंड्रोम में कैसे मदद करता है?

डोपामाइन डिटॉक्स एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति एक निश्चित समय के लिए उन सभी चीजों से दूरी बना लेता है जो दिमाग को तुरंत और कृत्रिम रूप से खुशी देती हैं, जैसे स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और वीडियो गेम्स। ऐसा करने से दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम दोबारा सामान्य हो जाता है, जिससे व्यक्ति की Mobile Addiction कम होती है और वह असल जिंदगी के कामों में मन लगा पाता है।

स्क्रीन टाइम का हमारी नींद की क्वालिटी से क्या संबंध है?

स्मार्टफोन की स्क्रीन से एक विशेष प्रकार की नीली रोशनी निकलती है जो हमारे शरीर में मेलाटोनिन नामक स्लीप हार्मोन के उत्पादन को रोकती है। यह हार्मोन हमारे शरीर को सोने का संकेत देता है। जब हम रात को देर तक स्क्रॉलिंग करते हैं, तो दिमाग को लगता है कि अभी दिन है, जिससे हमारी Sleep Quality खराब हो जाती है और सुबह उठने पर थकान बनी रहती है।

क्या Silent Scrolling Syndrome और Doomscrolling एक ही चीज हैं?

नहीं, दोनों में अंतर है। Doomscrolling में व्यक्ति सचेत रूप से केवल नकारात्मक, दुखद या डरावनी खबरों को लगातार पढ़ता रहता है, जिससे उसके अंदर चिंता और डर पैदा होता है। जबकि Silent Scrolling Syndrome में व्यक्ति बिना किसी खास भावना के, पूरी तरह सुन्न होकर हर तरह के मिक्स कंटेंट को बिना किसी उद्देश्य के बस स्क्रॉल करता जाता है।

Editorial
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