Depression और Anxiety एक साथ क्यों होते हैं? Psychology और Therapists क्या कहते हैं

क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपका मन किसी बात को लेकर इतना ज्यादा परेशान है कि आपके विचार रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं, लेकिन उसी समय आपके भीतर इतनी भी हिम्मत नहीं है कि आप बिस्तर से उठकर पानी का एक गिलास ले सकें? आप जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं, आपके पैर भागने के लिए छटपटा रहे हैं, लेकिन कोई अनदेखा बोझ आपको पीछे की तरफ खींच रहा है।

यह स्थिति बहुत ही अजीब और थका देने वाली होती है। बहुत से लोग अपने जीवन में इस उलझन भरे अनुभव से गुजरते हैं जहां घबराहट और उदासी दोनों एक साथ उन पर हमला कर देते हैं। इस स्थिति को ठीक से समझे बिना लोग खुद को ही दोष देने लगते हैं। जब हम मानसिक स्वास्थ्य की बात करते हैं, तो अक्सर डिप्रेशन और एंग्जायटी को दो अलग-अलग बीमारियों के रूप में देखा जाता है।

असलियत यह है कि यह दोनों समस्याएं बहुत गहरी जुड़ी हुई हैं और अक्सर एक ही इंसान के भीतर एक साथ मौजूद होती हैं। इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि आप अकेले नहीं हैं जो इस दर्द से गुजर रहे हैं। मनोविज्ञान की दुनिया में इस जुड़ाव को बहुत गहराई से समझा गया है।

Depression और Anxiety में क्या अंतर है?

इस पूरी उलझन को सुलझाने के लिए सबसे पहले हमें इन दोनों स्थितियों को अलग-अलग समझना होगा। एंग्जायटी को अगर हम आसान शब्दों में कहें तो यह भविष्य को लेकर होने वाला एक गहरा डर है।

जब कोई व्यक्ति एंग्जायटी से जूझ रहा होता है, तो उसका दिमाग हमेशा आने वाले कल की चिंताओं में डूबा रहता है। उसे हर छोटी बात में कोई बड़ा खतरा नजर आने लगता है। जैसे, ऑफिस में बॉस ने एक सामान्य मीटिंग बुलाई और कर्मचारी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि कहीं उसकी नौकरी तो नहीं चली जाएगी। इसमें शरीर और मन हमेशा हाई अलर्ट पर रहते हैं। मांसपेशियों में खिंचाव होना, सांसें तेज चलना, हाथों में पसीना आना और लगातार Overthinking करना इसके मुख्य लक्षण हैं।

यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें इंसान का पूरा सिस्टम भागने या लड़ने के लिए तैयार रहता है।

दूसरी तरफ, डिप्रेशन का संबंध मुख्य रूप से हमारे भूतकाल और वर्तमान की खालीपन की भावना से होता है। डिप्रेशन में इंसान का मन गहरी उदासी, निराशा और ऊर्जा की कमी से घिर जाता है। जो चीजें कभी खुशी देती थीं, जैसे दोस्तों से बात करना, घूमना या मनपसंद खाना खाना, उन सब चीजों से अचानक रुचि खत्म हो जाती है।

डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति को महसूस होता है कि अब जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं हो सकता और वह खुद को बिल्कुल लाचार मानने लगता है। इसमें नींद की कमी होना या बहुत ज्यादा नींद आना, भूख न लगना और खुद को पूरी दुनिया से अलग कर लेने की इच्छा होना बहुत आम बात है। एंग्जायटी जहां इंसान को बहुत ज्यादा बेचैन और सक्रिय कर देती है, वहीं डिप्रेशन इंसान को बिल्कुल सुस्त और निष्क्रिय बना देता है। जब यह दोनों भावनाएं एक साथ मिलती हैं, तो इंसान का Emotional Health पूरी तरह से डगमगा जाता है।

दोनों एक साथ क्यों हो सकते हैं?

अब सवाल यह उठता है कि जो दो मानसिक स्थितियां एक-दूसरे से इतनी अलग दिखती हैं, वे एक साथ कैसे आ सकती हैं। साइकोलॉजी कहती है कि हमारा दिमाग और शरीर भावनाओं को संभालने के लिए एक जटिल सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं। इसके पीछे कई जैविक और व्यावहारिक कारण जिम्मेदार होते हैं।

हमारे दिमाग के भीतर एक छोटा सा हिस्सा होता है जिसे अमिगडाला कहा जाता है। यह हिस्सा हमारे शरीर का अलार्म सिस्टम है जो किसी भी खतरे को देखकर एक्टिव हो जाता है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक बहुत ज्यादा Stress से गुजरता है, तो उसका अमिगडाला लगातार काम करने लगता है। इसके कारण शरीर में स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होते रहते हैं। यह लगातार बनी रहने वाली घबराहट ही एंग्जायटी का रूप ले लेती है।

जब दिमाग का यह अलार्म सिस्टम महीनों या सालों तक बिना रुके बजता रहता है, तो अंत में हमारा पूरा नर्वस सिस्टम थक जाता है। इस मानसिक और शारीरिक थकावट के बाद दिमाग खुद को बचाने के लिए एक शटडाउन मोड में चला जाता है। इसी शटडाउन मोड को हम डिप्रेशन कहते हैं। इस तरह, लंबे समय तक चलने वाली एंग्जायटी धीरे-धीरे डिप्रेशन को जन्म दे देती है।

इसके अलावा, हमारे जीवन के पुराने कड़वे अनुभव या बचपन के कोई मानसिक आघात भी इन दोनों को एक साथ ला सकते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में बहुत अधिक भावनात्मक बोझ महसूस करता है और उसकी Emotional Regulation यानी भावनाओं को संभालने की क्षमता कमजोर हो जाती है, तो डिप्रेशन और एंग्जायटी एक साथ उसके मन पर कब्जा कर लेते हैं।

Depression और Anxiety का चक्र कैसे बनता है?

इन दोनों समस्याओं का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह दोनों मिलकर एक ऐसा दुष्चक्र बना लेती हैं जिससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल लगने लगता है। यह चक्र कैसे काम करता है, इसे हम एक भारतीय युवा के उदाहरण से समझ सकते हैं।

मान लीजिए राहुल नाम का एक लड़का है जो अपनी परीक्षा को लेकर बहुत ज्यादा चिंता में है। उसके मन में लगातार Overthinking चल रही है कि अगर वह फेल हो गया तो समाज क्या कहेगा। यह चिंता उसकी एंग्जायटी है। इस चिंता के कारण वह रात भर सो नहीं पाता और उसका मानसिक तनाव चरम पर पहुंच जाता है।

अगले दिन, इस अत्यधिक तनाव और नींद की कमी के कारण राहुल के शरीर में बिल्कुल ऊर्जा नहीं बचती। वह पढ़ाई करने के लिए बैठता है लेकिन उसका ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता। जब वह खुद को पढ़ाई करने में असमर्थ पाता है, तो उसके मन में निराशा की भावना पैदा होने लगती है। उसे लगता है कि वह किसी काम का नहीं है और उसका भविष्य पूरी तरह से अंधकार में है।

यह निराशा और लाचारी की भावना डिप्रेशन है। अब डिप्रेशन के कारण वह पढ़ाई करना पूरी तरह से छोड़ देता है और खुद को कमरे में बंद कर लेता है। जब वह पढ़ाई नहीं करता, तो उसकी परीक्षा की चिंता और ज्यादा बढ़ जाती है। इस तरह एंग्जायटी डिप्रेशन को बढ़ाती है और डिप्रेशन फिर से एंग्जायटी को हवा देता है। यह चक्र लगातार घूमता रहता है और व्यक्ति इसमें बुरी तरह फंस जाता है।

रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका क्या असर पड़ता है?

जब डिप्रेशन और एंग्जायटी किसी व्यक्ति के जीवन में एक साथ प्रवेश करते हैं, तो उसकी पूरी दिनचर्या बिखर जाती है। सबसे पहला और गहरा असर उसकी कार्यक्षमता और पढ़ाई पर पड़ता है। सुबह उठना ही एक बहुत बड़ा काम लगने लगता है।

व्यक्ति को ऑफिस जाने या कॉलेज जाने की सोच कर ही घबराहट होने लगती है, और जब वह वहां पहुंचता है, तो डिप्रेशन के कारण उसका किसी काम में मन नहीं लगता। छोटे-छोटे निर्णय लेना, जैसे आज खाने में क्या खाना है या कौन से कपड़े पहनने हैं, बहुत भारी लगने लगते हैं।

इसके साथ ही, इंसान का आत्मविश्वास पूरी तरह से टूट जाता है। उसे महसूस होने लगता है कि वह अपनी जिंदगी के फैसलों को सही से नहीं संभाल पा रहा है। नींद का पूरा पैटर्न बदल जाता है। रात को सोते समय दिमाग में विचारों का तूफान चलता रहता है जिसके कारण नींद नहीं आती, और सुबह के समय बिस्तर छोड़ने की ताकत महसूस नहीं होती।

भूख पर भी इसका सीधा असर पड़ता है, कुछ लोग तनाव में बहुत ज्यादा खाने लगते हैं तो कुछ लोगों की भूख पूरी तरह से मर जाती है। Human Behavior में आने वाले ये बदलाव धीरे-धीरे व्यक्ति को उसकी सामान्य जिंदगी से बहुत दूर ले जाते हैं।

रिश्तों पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?

मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारे सामाजिक जीवन और आपसी रिश्तों से होता है। जब कोई व्यक्ति इस दोहरे मानसिक दबाव से गुजर रहा होता है, तो उसके रिश्तों में दूरियां आने लगती हैं। एंग्जायटी के कारण वह हर समय चिड़चिड़ा रह सकता है, जिससे घर के लोगों या दोस्तों के साथ छोटी-छोटी बातों पर बहस हो सकती है।

वहीं दूसरी ओर, डिप्रेशन के कारण वह खुद को पूरी तरह से सोशल लाइफ से अलग कर लेता है। जब दोस्त उसे बाहर घूमने के लिए बुलाते हैं, तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर मना कर देता है।

परिवार के लोग अक्सर इस स्थिति को समझ नहीं पाते। उन्हें लगता है कि व्यक्ति जानबूझकर ऐसा कर रहा है या वह आलसी हो गया है। वे अक्सर कहते हैं कि तुम खुश रहा करो या सुबह जल्दी टहला करो, सब ठीक हो जाएगा। इस तरह की बातें बीमार व्यक्ति को और ज्यादा लाचार महसूस करवाती हैं क्योंकि वह चाहकर भी खुश नहीं रह पाता।

बातचीत पूरी तरह से बंद हो जाने के कारण रिश्तों में एक अजीब सा खालीपन आ जाता है। पीड़ित व्यक्ति को लगता है कि कोई भी उसके दर्द को नहीं समझ सकता, जिससे उसकी मानसिक स्थिति और ज्यादा खराब होने लगती है।

Psychology के अनुसार इससे बाहर निकलने के प्रभावी तरीके

मनोविज्ञान हमें बताता है कि भले ही यह स्थिति बहुत कठिन है, लेकिन इससे बाहर निकलने के वैज्ञानिक और बेहद व्यावहारिक रास्ते मौजूद हैं। थेरेपिस्ट इस स्थिति में सबसे ज्यादा भरोसा CBT यानी कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी पर करते हैं।

यह थेरेपी हमारे सोचने के तरीके और हमारे व्यवहार के बीच के संबंध को सुधारने का काम करती है। इसमें थेरेपिस्ट व्यक्ति को यह सिखाते हैं कि कैसे उसके नकारात्मक विचार उसके डर और उदासी को बढ़ा रहे हैं। उन विचारों को पहचानकर उन्हें बदलना ही इस थेरेपी का मुख्य उद्देश्य है।

इसके अलावा, दैनिक जीवन में Mindfulness का अभ्यास करना बहुत फायदेमंद साबित होता है। माइंडफुलनेस का मतलब है अपने वर्तमान पल में जीना। जब आपका दिमाग भविष्य की चिंताओं या अतीत के दुखों में भाग रहा हो, तो अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करके खुद को वर्तमान में लाना सीखना बहुत जरूरी है।

इसके लिए आप ग्राउंडिंग तकनीकों का सहारा ले सकते हैं। जब भी घबराहट बहुत ज्यादा बढ़ जाए, तो अपने आस-पास की पांच ऐसी चीजों को देखें जिन्हें आप छू सकते हैं, सुन सकते हैं या महसूस कर सकते हैं। यह तकनीक आपके दिमाग के अलार्म सिस्टम को शांत करती है।

अपने लिए बहुत छोटे और आसान लक्ष्य तय करना सीखें। अगर आप डिप्रेशन के कारण पूरा कमरा साफ नहीं कर पा रहे हैं, तो सिर्फ अपने बिस्तर को ठीक करने का लक्ष्य रखें। जब आप एक छोटा काम पूरा करते हैं, तो आपके दिमाग में अच्छा महसूस कराने वाले केमिकल रिलीज होते हैं, जिससे आपका आत्मविश्वास धीरे-धीरे वापस आने लगता है। शारीरिक रूप से सक्रिय रहना भी बेहद जरूरी है।

रोजाना सिर्फ पंद्रह से बीस मिनट की सामान्य सैर भी आपके मूड को काफी हद तक सुधार सकती है। इसके साथ ही, खुद के प्रति दयालु होना यानी Self Compassion का भाव रखना बहुत जरूरी है। खुद को यह समझाएं कि बीमार होना कोई अपराध नहीं है और ठीक होने में समय लगता है। इस पूरी प्रक्रिया में निरंतरता सबसे ज्यादा मायने रखती है।

क्या दवाइयां जरूरी होती हैं?

जब मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बहुत ज्यादा गंभीर हो जाती हैं, तो मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि क्या इसके लिए दवाइयों की जरूरत है। इस विषय पर बहुत ही जिम्मेदारी से विचार करने की आवश्यकता है।

हर व्यक्ति की मानसिक स्थिति और उसके लक्षण अलग होते हैं। कुछ लोगों के लिए केवल थेरेपी और जीवनशैली में बदलाव करना ही काफी होता है, जबकि कुछ मामलों में जहां लक्षण बहुत ज्यादा तीव्र होते हैं और व्यक्ति अपना सामान्य जीवन जीने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है, वहां दवाइयों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह दवाइयां दिमाग के भीतर न्यूरोट्रांसमीटर के संतुलन को ठीक करने में मदद करती हैं, जिससे व्यक्ति का मूड स्थिर होता है और उसकी घबराहट कम होती है। दवाइयां लेने या न लेने का निर्णय हमेशा एक योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या साइकियाट्रिस्ट की सलाह पर ही लिया जाना चाहिए।

कभी भी खुद से या किसी के कहने पर कोई दवा शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए। सही मार्गदर्शन में किया गया इलाज ही आपको सही दिशा में ले जा सकता है।

अपने परिवार और दोस्तों से कैसे बात करें?

अपने दिल की बात किसी के सामने रखना इस समस्या से उबरने का पहला और बहुत महत्वपूर्ण कदम है। हमारे समाज में आज भी मानसिक बीमारियों को लेकर एक झिझक बनी हुई है, लेकिन इस स्टिग्मा को तोड़ने की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी।

जब आप अपने परिवार या दोस्तों से बात करने का मन बनाएं, तो एक शांत समय चुनें। उनसे खुलकर और ईमानदारी से कहें कि आप पिछले कुछ समय से मानसिक रूप से अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं।

बातचीत के दौरान कठिन शब्दों का प्रयोग करने के बजाय अपनी भावनाओं को सरल तरीके से बताएं। आप कह सकते हैं कि मुझे बिना किसी वजह के बहुत ज्यादा डर लगता है और मेरा किसी काम में मन नहीं लगता। उन्हें यह समझाएं कि आपको उनसे किसी तुरंत समाधान की उम्मीद नहीं है, बल्कि आप सिर्फ यह चाहते हैं कि वे आपकी बात को बिना किसी जजमेंट के सुनें और आपको अपना सहयोग दें। जब आप अपनी भावनाओं को साझा करते हैं, तो आपके मन का आधा बोझ वैसे ही हल्का हो जाता है।

कब Professional Help लेना जरूरी हो जाता है?

कई बार लोग सोचते हैं कि समय के साथ सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा, लेकिन कुछ ऐसे संकेत होते हैं जिन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर आपकी उदासी और घबराहट को दो हफ्ते से ज्यादा का समय हो गया है और यह आपके काम, पढ़ाई या रिश्तों को पूरी तरह से प्रभावित कर रही है, तो यह पेशेवर मदद लेने का सही समय है।

जब आपको लगने लगे कि आपके घरेलू उपाय या दोस्तों से बात करना भी असरदार साबित नहीं हो रहा है, या आपके मन में जीवन को लेकर निराशा इतनी गहरी हो गई है कि आपको आगे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है, तो तुरंत किसी थेरेपिस्ट या काउंसलर से संपर्क करें।

पेशेवर मदद लेना किसी भी तरह की कमजोरी की निशानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि आप अपने जीवन को सुधारने के लिए गंभीर हैं और आपके भीतर खुद को ठीक करने का साहस है।

Psychology हमें क्या सिखाती है?

मनोविज्ञान हमें इंसानी दिमाग की एक बहुत ही खूबसूरत खूबी के बारे में बताता है जिसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि हमारा दिमाग कोई पत्थर की लकीर नहीं है, इसे बदला जा सकता है। आप आज जिस मानसिक स्थिति में हैं, जीवन भर उसी में रहने के लिए मजबूर नहीं हैं। नए विचारों, नई आदतों और सही थेरेपी की मदद से दिमाग के काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदला जा सकता है।

यह विज्ञान हमें सिखाता है कि मानसिक स्वास्थ्य की रिकवरी कोई एक दिन का चमत्कार नहीं है। यह एक यात्रा है जिसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। किसी दिन आप बहुत अच्छा महसूस कर सकते हैं और किसी दिन फिर से पुरानी उदासी लौट सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपका प्रयास बेकार चला गया।

हर छोटा कदम, चाहे वह सुबह समय पर उठना हो या अपने थेरेपिस्ट से बात करना हो, आपको पूरी तरह से ठीक होने की दिशा में आगे बढ़ाता है। आपके भीतर इस मानसिक तनाव से लड़ने और एक बेहतर जीवन जीने की पूरी क्षमता मौजूद है।

डिप्रेशन और एंग्जायटी जब एक साथ जीवन पर हमला करते हैं, तो ऐसा महसूस हो सकता है कि आप एक बहुत ही गहरे और अंधेरे कुएं में गिर गए हैं जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। यह स्थिति निश्चित रूप से बहुत भारी और थका देने वाली होती है, लेकिन मनोविज्ञान और दुनिया भर के थेरेपिस्ट इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस स्थिति से पूरी तरह बाहर आना मुमकिन है।

सही समझ, अपनों का साथ, अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मार्गदर्शन की मदद से आप अपने मन की शांति को दोबारा हासिल कर सकते हैं। आपकी रिकवरी की शुरुआत किसी बहुत बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि आज उठाए जाने वाले एक छोटे और निरंतर कदम से होती है। खुद पर भरोसा रखें, क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह का आना तय है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या Depression और Anxiety दोनों पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं?

हां, सही समय पर सही इलाज, जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी, जीवनशैली में बदलाव और जरूरत पड़ने पर डॉक्टरी सलाह की मदद से डिप्रेशन और एंग्जायटी से पूरी तरह से उबरा जा सकता है और एक सामान्य व खुशहाल जिंदगी जी जा सकती है।

मुझे कैसे पता चलेगा कि मुझे केवल सामान्य तनाव है या मैं डिप्रेशन और एंग्जायटी से जूझ रहा हूं?

सामान्य तनाव किसी काम के पूरा होने या समस्या के खत्म होने पर दूर हो जाता है। अगर आपकी उदासी, घबराहट और काम में मन न लगने की स्थिति लगातार दो सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहती है और यह आपकी दिनचर्या को प्रभावित करने लगती है, तो यह डिप्रेशन और एंग्जायटी के लक्षण हो सकते हैं।

क्या ओवरथिंकिंग करने से भी डिप्रेशन और एंग्जायटी एक साथ हो सकते हैं?

लगातार और अनियंत्रित ओवरथिंकिंग हमारे दिमाग के स्ट्रेस सिस्टम को हमेशा एक्टिव रखती है। जब हम किसी बात को लेकर बहुत ज्यादा चिंता करते हैं, तो वह एंग्जायटी को जन्म देती है, और जब इस चिंता के कारण मानसिक थकावट बढ़ जाती है, तो व्यक्ति धीरे-धीरे डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।

बिना दवाइयों के डिप्रेशन और एंग्जायटी को कैसे कम किया जा सकता है?

शुरुआती या हल्के लक्षणों में थेरेपी, माइंडफुलनेस का नियमित अभ्यास, गहरी सांस लेने के व्यायाम, रोजाना शारीरिक सक्रियता, पर्याप्त नींद और एक अच्छी दिनचर्या का पालन करके डिप्रेशन और एंग्जायटी को काफी हद तक नियंत्रित और कम किया जा सकता है।

यदि मेरा कोई करीबी इस मानसिक स्थिति से गुजर रहा है तो मैं उसकी मदद कैसे कर सकता हूं?

अपने करीबी की मदद करने के लिए सबसे पहले उसकी बातों को बिना किसी जजमेंट या सलाह के ध्यान से सुनें। उन्हें यह महसूस कराएं कि आप उनके साथ हैं और उनके इस कठिन समय में उन्हें एक सुरक्षित माहौल देकर किसी अच्छे थेरेपिस्ट से सलाह लेने के लिए प्रेरित करें।

Editorial
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